Tuesday, June 12, 2012

परिंदे भी लगाते है आवाज़ ...

कभी-कभी
अचानक ही
चुप के शिकंजो में फंसे
शांत बैठे
खामोश परिंदे
बेचैन हो उठते है
फडफडाने लगते है
उनके प्राण
पंखो की तड़प से
फूट पड़ते है अक्षर
और ,
नीले आसमान की हथेली
अचकचा कर
खोल बैठती है
अपनी आँख
जर्द सफेदी का समेकन भी
मसल डालता है
सम्मोहित आँखों का
मीलों लंबा
उनींदापन
और सब कुछ
जाग उठता है
ख्वाहिशो की
मरी कोख
फिर जी उठती है
दीवारों पर बिछा
धूप का अक्स
लपेट देता है
अपनी बाहों का
पुकारा हुआ गुनगुनापन
सिफ और सिर्फ
मेरे चारों ओर ,
पर सुनो सखी ,
ऐसा कभी-कभी ही होता है कि
खामोश परिंदे भी
बेचैन हो उठते है .....



                ~ हेमा ~

12 comments:

  1. मन की बेचैनी भी झलक रही है .... खूबसूरत रचना

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  2. भावमय करते शब्‍दों का संगम ... बेहतरीन प्रस्‍तुति।

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  3. बैचनी बोलती है ... नेला आसमां ... धूप का अक्स भी कुछ कहता है जो और कुछ नहीं पास बैचेनी होती है ...

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  4. .......इस उत्कृष्ट रचना के लिए ... बधाई स्वीकारें...!!

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  5. बहुत -बहुत सुन्दर रचना...
    सुन्दर प्रस्तुति....
    :-)

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  6. बहुत -बहुत सुन्दर रचना..

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  7. बेहतरीन रचना...

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  8. जर्द सफेदी का समेकन भी
    मसल डालता है
    सम्मोहित आँखों का
    मीलों लंबा
    उनींदापन...

    सुंदर रचना...
    सादर।

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  9. अपनी बाहों का
    पुकारा हुआ गुनगुनापन
    सिफ और सिर्फ
    मेरे चारों ओर ,
    पर सुनो सखी ,
    ऐसा कभी-कभी ही होता है कि
    खामोश परिंदे भी
    बेचैन हो उठते है .....
    बेहतर भावाभिव्यक्ति ...!

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