Sunday, June 26, 2011

सुंनो ये उठती ध्वनियाँ


यह प्रारंभ के दिवस है
धूप फेंकी है सूरज ने 
मेरी जड़ी खिड़की पर छपाक,
चौड़ी मुसी सफेदी
किनारी पतली लाल
अंध केशो पर टिकी
तुमको कैसे मालुम
अन्दर बेचैन अंधेरो में
रौशनी की भूख 
जाग आई है
सुनो, देखो
उतार फेंको 
कमल के फूलो का  खूबसूरत
यह आबनूसी चोला 
सुनो-
इस हलकी चमक से 
उठती ध्वनियाँ
स्थगित मत कर निरखना 
धूप की मुस्कान
साध तू व्याप्त  आज्ञापकों का अराध्य 
यह प्रारंभ के दिवस है
तुमको नहीं मालुम
यह मेरे - तुम्हारे 
वशीकरण के दिन है !!      




                       *** हेमा ***

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