Sunday, January 19, 2014

क्योंकि कहा जाना एक जरूरी पहल है ...



माना कि बरसना-गरजना और
हमारी पीठ पर तड़ा-तड़ टूट कर
बरस जाना ...तुम्हारा स्वभाव ठहरा ...फिर भी ...
मेरी ही जड़ों पर पडी है जो
मेरी ही ...
चिंदी-चिंदी हुई
पीले फूलों की पीली पाँखुरियाँ ...

कि तुम्हारे प्रति है उनके मन में बेतरह क्रोध
अजन्मी रह गई छीमियों के लिए ...
तीन दिनों की
बारिश,आँधी-पानी और पाले के बाद निकली धूप से
झुकी हुई टेढ़ी कमर और
बेहद भारी, भीगी पलकों वाली
पलाई हुई, ठिठुरी सरसों ने
दबी जबान से ही सही

पर कहा ...
कि मेरे पीले मन में आ बैठी है
दुःख,उदासी और घोर निराशा ...




~~~हेमा~~~

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