Tuesday, December 20, 2011

अपने लिए ....

तुम्हारे घर की
तिमंजिली खिडकी से
कूदती है और रोज भाग जाती है
छिली कोहनियों और फूटे घुटनों वाली औरत
ढूंढती है नीम का पेड़
और झूलती है
जीवन-जौरिया पर
ऊँची पेंगो का झूला
नीले आसमान में उड़ते
आवारा बादलों को
मारती है एक करारी लात
गूंजती फिरती है
सूफियो के राग सी
तुम्हारी पंचायतो के ऊसरों पर
खेलती है छुपम-छुपाई
हाँफती है थकती है
किसी खेत की मेंड़ पर बैठ
गंदले पानी से धोती है
अपने सिर माथे रखी
लाल स्याही की तरमीमें
फिर बड़े जतन से
चुन-चुन कर निकालती है
कलेजे की कब्रगाह में गड़ी
छिनाल की फाँसे
सहिताती है
तुम्हारे अँधेरे सीले भंडारगृह से निकली
जर्दायी देह को दिखाती है धूप
साँसों की भिंची मुट्ठियों में
भरती है हवा के कुछ घूँट
मुँहजोर सख्तजान है
फिर-फिर लौटती है
तुम्हारे घर
कुटती है पिटती है
मुस्काती है
और बोती है तुम्हारे ही आँगन में
अपने लिए
मंगलसूत्र के काले दाने
लगाती है तुम्हारे ही द्वार पर
अपने लिए
अयपन और टिकुली के दिठौने .....






***हेमा ***

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9 comments:

  1. " मुंहज़ोर सख्त जान है ' फिर फिर लौटती है / तुम्हारे घर /कुटती है पिटती है / मुस्काती है..... अपने लिए टिकुली के दिठोने." इतने कुछ के बाद, अपने लिए इतना भर!

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  2. कविता में बात तो है है हेमा.

    --

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  3. कविता अपने साथ एक ऐसी यात्रा पर ले जाती है, जहाँ उसे खुद की तलाश है, निजत्व को खोजती एक औरत जी लेती है तमाम विसंगतियों के बावजूद अपना भरपूर जीवन, किन्तु लौटना भी निश्चित ही है.......बहुत ही रोचक....अलग और उन्मुक्त.....बहुत अच्छा लगा पढ़कर......

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    1. अति सुन्दर , आभार.

      कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधार कर स्नेह प्रदान करें.

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  4. प्रभावशाली ...
    शुभकामनायें आपको !

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  5. सशक्त रचना ....कड़वा मगर सच ...

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  6. दमदार और असरदार!

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