Saturday, March 2, 2013

छुटंकी हथेलियों में स्वादों की पुड़िया ...

 

आज तो मुझे छुट्टी के बाद स्कूल के गेट के बाहर खडे रँग-बिरँगे चूरनवाले, उसकी ठिलिया और अपनी छुटंकी  सी हथेली में दबी पसीजी चवन्नी की याद बेतरह सता रही है ! 
लाल इमली,सादी इमली ,अंदर से लाल बाहर से हरी इमली ,कैथा ,कमरख , बड़हैर ,छोटे-छोटे लाल बेर, गीले चूरन का  गोवर्धन ,पता नहीं किसी ने तेज़ाब से छौंका गीला लाल चूरन खाया है या नहीं उन स्वादों की याद से मेरा मुँह अनगिनत रसो से भीग गया है और मन यादों से! 

मेरी सारी चवन्नियाँ उसी बचई चूरनवाले की ठिलिया ने गपकी है ! अखबारी कागज़ की पुडियो और नन्हे-मुन्ने लिफाफों में बंधी कभी किसी तो कभी किसी चीज के लिए ! आँखे आज भी चूरनवाली ठिलिया पर बचई का धूप तपा चेहरा और खट्टी मुस्कान ढूढती है | 

कभी-कभी जब मेरी चवन्नी बतौर सजा कुपित अम्मा जब्त कर लिया करती थी तो बचई अपनी रोज की ग्राहक की आँखों की ललचाई भाषा पढ़ लिया करता था और उस दिन मेरे हाथ मुफ्त की पुडिया लगती थी ! और पता है रोज की पुडियों की बनिस्बत इस पुड़िया में स्वाद कही ज्यादा हुआ करता था ! :)

घर पर किसी को भी कभी हमारी इस मुफ्त की कमाई की हलकी सी भी भनक हमने नहीं लगने दी. मुफ्त की थाली के ढेरो बँटाईदार जो होते है ... और अगर अपनी दबंगई में हिस्सा ना दो तो जाने कौन अपनी लगावा-जुझाई की पूँछ से अम्मा के कानों में आग लगाता और हमारी पीठ कुटवाता ...
बचई की ठिलिया आज भी आबाद है ... बचई की जगह अब उसके कुछ ज्यादा धूप तपी रंगत वाले लड़के भुल्लन ने ले ली है और मेरी जगह स्कूल के दूसरे बच्चों ने ...
भुल्लन मुझे नहीं पहचानता है ... यूँ तो बचई होता तो वो ही कहाँ पहचानता मुझे मेरी छुटंकी हथेलियाँ बड़ी जो हो गई है ... और चवन्नियाँ भी तो समय की परतों में खो गई है ... :( 
इमली खाने की तो ऐसी शौक़ीन थी हमारी जबान कि एक बार किसी ने खबर दे दी कि फूलबाग में बिजलीघर के पास एक बहुत बड़ा और पुराना इमली का पेड़ है और इमली से लदा भी है ...
एक दुपहरी हमने अपनी दुपटिया सटकाई और काली छतरी ले कर पहुँच गये बिजलीघर के अहाते में ...  अपनी काली छतरी के साथ फ्रॉक पहने और चूंकि धनियाँ-मिर्ची, आलू लेने निकले थे तो एक झोला भी थामे थे ....
 उस दुपहरी पता नहीं हम शायद कोई कूड़ा बीनने वाले बच्चे की छवि प्रस्तुत कर गये वहाँ घूमते एक आवारा कुत्ते की आँखों में ... उन कुत्ते महाशय ने बिजलीघर के अहाते के चारों ओर जिंदगीभर याद रहे ऐसे दौड़ाया ..  उन कुत्ते महाशय से कहीं ज्यादा जोरों से हम बचाओ-बचाओ भौंके होंगे ...चीखा-चिल्ली से बिजलीघर से दो-चार आदमी निकले उन्होने दो-चार ढेले फेंक कर कुत्ते को भगा दिया और इस तरह हमें बचाया गया ...
उस दिन के बाद हम  फिर कभी किसी के अहाते में इमली चुराने नहीं गये ऐसा तो नहीं ही था अलबत्ता हम पहले से ही खूब ठोंक-बजा लेते थे कि आस-पास किसी कुत्ते महाशय का वास तो नहीं बस   ... :)  
इनके साथ एक और भी स्वाद है इतना खट्टा खाने के लिए गाहे-बगाहे अम्मा से पड़ने वाले जोरदार धमक्के और उनके शब्द ,"अरे लड़की ! खून पानी बन जाएगा हड्डियाँ गल जाएँगी मरेगी तू !" आँखों से बहता नमकीन पानी और मुँह में घुलती इमली का पानी ... अद्भुत मेल था ... वैसा मेल और स्वाद मेरी जबान फिर कभी नहीं पा पायी !!!

बचपन के स्वाद क्या बचपने की वजह से इतने अमिट होते है कि हम आजीवन उनसे गले मिलते रहते है!

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6 comments:

  1. "बचपन के स्वाद क्या बचपने की वजह से इतने अमिट होते है कि हम आजीवन उनसे गले मिलते रहते है!" बहुत अच्छा संस्मरण है.

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  2. बचपन के स्वाद क्या बचपने की वजह से इतने अमिट होते है कि हम आजीवन उनसे गले मिलते रहते है! सच कहा :)

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  3. बचपन की स्मृतियों को सजीव करती एक बेहतरीन रचना

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  4. बचपन के स्वाद क्या बचपने की वजह से इतने अमिट होते है कि हम आजीवन उनसे गले मिलते रहते है!
    बहुत खूबसूरत पंक्तियां

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  5. भुल्लन मुझे नहीं पहचानता है ... यूँ तो बचई होता तो वो ही कहाँ पहचानता मुझे मेरी छुटंकी हथेलियाँ बड़ी जो हो गई है ... और चवन्नियाँ भी तो समय की परतों में खो गई है ... :(

    खूब संस्मरण लिखा है!

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  6. एक एक शब्द में वही जीवंतता हैं जैसे हमने अपने बचपन में गुजारी हैं कईत के फल के लिए धूप में भागना, आम के टिकोरे के लिए लड़ना और भभोरन का गुड़ का लकठोँ। शुक्रिया बचपन याद कराने के लिए।

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